बॉलीवुड तब और अब भाग 3: 90 के दशक का सिनेमा, भावनाएं और बाज़ार
90 के दशक का हिंदी सिनेमा भावनाओं और बाज़ार के बीच संतुलन बनाता हुआ बॉलीवुड: तब और अब Part 3: नब्बे का दशक, भावनाओं का उभार, बाज़ार का आगमन और सिनेमा की बदलती आत्मा नमस्कार मित्रों, अगर हिंदी सिनेमा के इतिहास को एक लंबी यात्रा की तरह देखें, तो नब्बे का दशक एक ऐसा पड़ाव है जहाँ गाड़ी रुकती नहीं, लेकिन उसकी दिशा बदलने लगती है। यह वह दौर है जिसे आज भी लोग बहुत प्यार से याद करते हैं। किसी को इसके गाने याद आते हैं, किसी को प्रेम कहानियाँ, किसी को विदेशों में बसे सेट और किसी को सितारों का चमकता हुआ स्टारडम। लेकिन नब्बे का दशक सिर्फ यादों का गुलदस्ता नहीं है। यह एक संक्रमण काल है। एक ऐसा दौर जहाँ हिंदी सिनेमा ने अपने पुराने गुस्से, अपनी सामाजिक बेचैनी और अपनी राजनीतिक तीव्रता को धीरे धीरे पीछे छोड़ा और भावनाओं, परिवार और बाज़ार की भाषा बोलनी शुरू की। बदलता भारत, बदलता सिनेमा 1991 के आसपास भारत आर्थिक रूप से एक नए रास्ते पर चला। उदारीकरण आया, बाज़ार खुला, विदेशी ब्रांड्स, नए सपने और उपभोक्ता संस्कृति ने जन्म लिया। समाज के भीतर जरूरत की जगह इच्छा ने लेनी शुरू की। और जब समाज बदलता है,...