क्यों 90 के दशक की फिल्में आज भी दिल के करीब हैं? सिनेमा संवाद की शुरुआत
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| नॉस्टेल्जिया का स्वर्णिम दशक |
क्यों 90 के दशक की फिल्में आज भी दिल के करीब हैं? और क्यों शुरू हुआ सिनेमा संवाद
कभी-कभी 90 के दशक की कोई फिल्म टीवी पर आ जाती है और मैं रुक जाता हूँ। कहानी याद होती है, गाने याद होते हैं, यहाँ तक कि डायलॉग भी याद होते हैं, फिर भी देखता हूँ। शायद इसलिए नहीं कि फिल्म नई लगती है, बल्कि इसलिए कि वो एहसास नया लगता है।
बहुत सालों से फिल्मों पर लिख रहा हूँ। पहले फेसबुक पर। वहाँ बहस होती थी, लोग कमेंट करते थे, कभी सहमति, कभी असहमति। लेकिन एक बात बार-बार महसूस हुई कि सोशल मीडिया पर लिखा हुआ ठहरता नहीं। पोस्ट कुछ घंटों तक चलती है, फिर भीड़ में गुम हो जाती है। उसी कमी को पूरा करने के लिए सिनेमा संवाद शुरू किया है। यह सिर्फ रिव्यू लिखने की जगह नहीं है। यह सिनेमा पर बात करने की जगह है।
अब बात 90 के दशक की।
क्या सच में वो दौर बेहतर था? या हम बस अपने समय को याद कर रहे हैं? जब दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे आई थी, तो प्रेम कहानी सिर्फ कहानी नहीं थी, एक सपना थी। बॉर्डर देखी तो देशभक्ति सीने में धड़कती थी। घायल या घातक जैसी फिल्मों में गुस्सा भी असली लगता था। उस दौर का हीरो चमकता कम था, लेकिन खड़ा ठोस दिखता था।
गाने आज भी 90 के दशक के बजते हैं तो माहौल बदल जाता है। तब गाने ट्रेंड नहीं करते थे, टिकते थे। आज बहुत कुछ आता है, बहुत कुछ चला जाता है। उस समय कम आता था, लेकिन याद रह जाता था। हाँ, यह भी सच है कि आज का सिनेमा पूरी तरह कमजोर नहीं है। तकनीक बेहतर है, विषयों की विविधता है, प्रयोग हैं। लेकिन शायद तब सादगी ज्यादा थी। शायद भावनाओं को जगह ज्यादा मिलती थी। या शायद हम ही बदल गए हैं।
सिनेमा संवाद की शुरुआत इसलिए कि फिल्मों को सिर्फ हिट या फ्लॉप के पैमाने पर न देखा जाए। किरदारों पर बात हो। कहानियों पर चर्चा हो। पुराने और नए दौर की तुलना हो। और सबसे जरूरी राय रखने की आज़ादी हो, लेकिन मर्यादा के साथ।
यह ब्लॉग किसी एक दौर का पक्ष नहीं लेगा। यह सिनेमा को समझने की कोशिश करेगा।
अगर आप भी मानते हैं कि फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, अनुभव है, तो यह मंच आपका है।
अब बताइए, 90 के दशक की कौन सी फिल्म आज भी आपके दिल के सबसे करीब है?

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