Anhonee 1952 Review in Hindi: राज कपूर नर्गिस क्लासिक

अनहोनी 1952 फिल्म समीक्षा राज कपूर नर्गिस

अनहोनी 1952: कल रात देखी एक फिल्म जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया

कल रात मैंने 1952 की फिल्म अनहोनी देखी। राज कपूर और नर्गिस की जोड़ी को कई बार देख चुका हूँ, लेकिन इस फिल्म का असर अलग था। यह वैसी फिल्म नहीं है जिसे देखकर आप बस कहानी खत्म होते ही आगे बढ़ जाएँ। इसे देखने के बाद थोड़ी देर चुप रहना पड़ता है।

अनहोनी का निर्देशन के. ए. अब्बास ने किया था। वह सिर्फ निर्देशक नहीं थे, बल्कि एक विचारधारा वाले लेखक भी थे। उनकी फिल्मों में हमेशा समाज और इंसान की स्थिति पर गहरी नजर मिलती है। यहाँ भी वही बात साफ दिखाई देती है। कहानी एक प्रेम संबंध से शुरू होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह हालात और इंसान की नियति पर बहस में बदल जाती है।

फिल्म की सबसे बड़ी खूबी नर्गिस की दोहरी भूमिका है। एक तरफ रूप है, जो संभ्रांत माहौल में पली-बढ़ी, सादगी और भरोसे से भरी लड़की है। दूसरी तरफ मोहिनी है, जो समाज के उस हिस्से से आती है जहाँ सम्मान से ज्यादा संघर्ष मिलता है। दोनों का चेहरा एक है, लेकिन जीवन की दिशा अलग। नर्गिस ने दोनों किरदारों को इतनी स्पष्टता से अलग किया है कि कभी भ्रम नहीं होता कि कौन सामने है। रूप की कोमलता और मोहिनी की कड़वाहट दोनों अलग-अलग दिखाई देती हैं।

राज कपूर इस फिल्म में अपनी आम छवि से अलग दिखते हैं। वह यहाँ एक वकील राजकुमार की भूमिका में हैं, जो आदर्शों पर विश्वास करता है। लेकिन जब मोहिनी उसकी जिंदगी में उलझन बनकर आती है, तो उसका संतुलन डगमगाने लगता है। राज कपूर का अभिनय संयमित है। वह चिल्लाते नहीं, बल्कि चेहरे के भाव से दुविधा दिखाते हैं। यह उनकी कम चर्चित लेकिन प्रभावशाली भूमिकाओं में से एक है।

फिल्म का संगीत रोशन ने दिया था, जिनका पूरा नाम रोशनलाल नागरथ था। संगीत इस फिल्म की भावनात्मक परत को और गहरा करता है। गीतकारों की टीम भी खास है। अली सरदार जाफ़री, नख्शब जारचवी, शैलेन्द्र और सत्येंद्र अथैया ने फिल्म के गीत लिखे। उस दौर में गीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, भावनाओं का विस्तार होते थे। यहाँ भी वही बात महसूस होती है।

फिल्म के कुछ गीत आज भी याद किए जाते हैं। “जिंदगी बदली मोहब्बत का मज़ा आने लगा” जिसे लता मंगेशकर और राजकुमारी ने गाया, और जिसके बोल नख्शब जारचवी ने लिखे, फिल्म में प्रेम और उम्मीद का रंग भरता है। “मैं दिल हूँ एक अरमान भरा” तलत महमूद की आवाज़ में एक दर्दभरा एकल गीत है, जिसके बोल सत्येंद्र अथैया ने लिखे थे। “मेरे दिल की धड़कन क्या बोले” लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज़ में शैलेन्द्र का लिखा हुआ गीत है, जो भावनाओं की उलझन को व्यक्त करता है। “कहॉ है उन्होने राज-ए-मोहब्बत” लता मंगेशकर की आवाज़ में एक और संवेदनशील रचना है, जिसे सत्येंद्र अथैया ने लिखा था। प्रमुख गायकों में लता मंगेशकर, तलत महमूद और राजकुमारी की आवाज़ें फिल्म को आत्मा देती हैं। इन गीतों में रोशन का संगीत कहानी से अलग नहीं लगता, बल्कि उसका हिस्सा बन जाता है।

अनहोनी की पटकथा का केंद्रीय विचार यही है कि क्या इंसान जन्म से वैसा होता है जैसा दिखाई देता है, या परिस्थितियाँ उसे वैसा बना देती हैं। मोहिनी का किरदार इस सवाल को गहराई देता है। उसे देखकर कई बार लगता है कि अगर उसके हालात अलग होते, तो शायद उसका स्वभाव भी अलग होता। फिल्म किसी को पूरी तरह खलनायक नहीं ठहराती। रूप अच्छी है, लेकिन कमजोर भी है। मोहिनी कठोर है, लेकिन भीतर से घायल भी। राजकुमार आदर्शवादी है, लेकिन भावनाओं में उलझ जाता है।

फिल्म की गति आज के हिसाब से धीमी है। लेकिन यही धीमापन उसके विचारों को जगह देता है। दृश्य ठहरते हैं, संवाद लंबे हैं, और पात्रों को सोचने का समय मिलता है। यह फिल्म तेज रफ्तार नहीं, गहराई से असर करती है।

फिल्म खत्म हुई तो मुझे लगा कि शीर्षक बिल्कुल सही है। अनहोनी सिर्फ किसी घटना का नाम नहीं, बल्कि उन हालात का नाम है जो इंसान को बदल देते हैं। कई बार जिंदगी में जो होता है, वह हमारे नियंत्रण में नहीं होता। लेकिन उस पर हमारी प्रतिक्रिया ही हमें परिभाषित करती है।

राज कपूर और नर्गिस की जोड़ी को लोग रोमांस के लिए याद करते हैं, लेकिन अनहोनी में उनका काम ज्यादा गंभीर और विचारशील है। नर्गिस की दोहरी भूमिका फिल्म की आत्मा है। राज कपूर का संयमित अभिनय उसे संतुलन देता है। के. ए. अब्बास का निर्देशन पूरी फिल्म को वैचारिक आधार देता है और रोशन का संगीत उसे भावनात्मक गहराई देता है।

अनहोनी देखने के बाद यही महसूस हुआ कि 1950 के दशक का सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं था, वह समाज से सवाल भी करता था। शायद यही वजह है कि इतने साल बाद भी यह फिल्म पुरानी नहीं लगती।

अगर आपने अनहोनी नहीं देखी है, तो इसे सिर्फ एक क्लासिक फिल्म समझकर मत देखिए। इसे एक विचार की तरह देखिए। तब समझ आएगा कि असली अनहोनी क्या होती है।

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