बॉलीवुड परदे पर रची मेहंदी: फिल्मों और गीतों में मेहंदी का सफर
बॉलीवुड परदे पर रची मेहंदी
मेहंदी का रंग सिर्फ हाथों पर नहीं चढ़ता, वह मन पर भी चढ़ता है। भारतीय सिनेमा ने इस रंग को बहुत गहराई से समझा है। शादी का घर हो, दुल्हन का इंतज़ार हो, प्रेम का इकरार हो या बिछड़ने की टीस, मेहंदी हर बार किसी न किसी भावना की भाषा बनकर आई है। जब परदे पर मेहंदी रची जाती है तो वह सिर्फ एक रस्म नहीं रहती, वह कहानी का हिस्सा बन जाती है।
बॉलीवुड में मेहंदी शब्द पर कई फिल्में बनीं। 1947 की फिल्म मेहंदी उस दौर के सामाजिक सिनेमा का हिस्सा थी, जब कहानियाँ परिवार और परंपराओं के इर्द गिर्द घूमती थीं। 1958 में आई मेहंदी ने इस शब्द को और भावनात्मक संदर्भ दिया। 1962 की फिल्म मेहंदी लगी मेरे हाथ तो सीधे शादी और नए रिश्तों की दुनिया में ले जाती है। उस दौर में मेहंदी का मतलब था उम्मीद, नया घर, नई शुरुआत।
1971 में महबूब की मेहंदी आई, जिसमें रोमांस और शायरी का खूबसूरत मेल था। राजेश खन्ना और लीना चंदावरकर की मौजूदगी ने मेहंदी को इश्क की पहचान बना दिया। 1980 की मेहंदी रंग लाएगी शीर्षक ही अपने आप में उम्मीद का वादा था। 1983 में फिर मेहंदी नाम से फिल्म आई, जहाँ पारिवारिक नाटक और सामाजिक उलझनें दिखीं। 1990 की मेहंदी बन गयी खून ने इस रंग को दर्द और बदले की दिशा में मोड़ दिया। 1991 की हीना में मेहंदी सरहदों के पार प्रेम का प्रतीक बनी। 1998 की मेहंदी ने घरेलू हिंसा और स्त्री संघर्ष की पृष्ठभूमि में इस रस्म को एक अलग अर्थ दिया। एक ही शब्द, लेकिन हर दशक में उसका अर्थ बदलता गया।
अगर गीतों की बात करें तो मेहंदी का रंग हिंदी फिल्म संगीत में और भी गहरा है। 1958 का मेहंदी रंग तो लायी हो या 1962 का मेहंदी लगी मेरे हाथ, दोनों में मेहंदी मिलन और नए सपनों का प्रतीक है। महबूब की मेहंदी हाथों में गीत ने प्रेम को उत्सव से जोड़ा। 1983 का मेरे अंगना मेहंदी का शादी के घर की चहल पहल को सामने लाता है। 1984 का मेहंदी कहती है ये बात और 1986 का लगी रे मेहंदी सज गयी उस समय के पारंपरिक माहौल को आवाज देते हैं।
लेकिन 1995 में जब दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे में मेहंदी लगा के रखना बजा तो जैसे यह गीत सिर्फ फिल्म का हिस्सा नहीं रहा, हर शादी का हिस्सा बन गया। शाहरुख और काजोल की मुस्कान, घर का माहौल, और गीत की लय ने मेहंदी को नए दौर की पहचान दे दी। 1998 की मेहंदी फिल्म के गीत मेहंदी बुलाए आ जा और दुल्हन कोई जब रचाती है मेहंदी ने फिर से इस रस्म को कहानी के केंद्र में रखा। 2000 में चल मेरे भाई का मेहंदी रंग लाएगी और जुबैदा का मेहंदी है रचने वाली दोनों अलग अंदाज में परंपरा को निभाते हैं। जुबैदा का गीत तो आज भी मेहंदी समारोहों में बजता है और हर बार वही पुरानी खुशबू ले आता है। 2001 की चौरी चौरी चुपके चुपके का मेहंदी मेहंदी गीत इस सिलसिले को आगे बढ़ाता है।
सिनेमा में मेहंदी सिर्फ खुशी का रंग नहीं है। कई बार यह इंतजार का प्रतीक भी बनी है। दुल्हन के हाथों में गहरी मेहंदी देख कर कहा जाता है कि पति उसे बहुत प्यार करेगा। फिल्मों में भी यही संवाद कई बार सुनाई देता है। लेकिन कुछ कहानियों में यही मेहंदी फीकी पड़ती दिखाई देती है, और दर्शक समझ जाता है कि रिश्ते में दरार आ गई है। यही सिनेमा की खूबसूरती है। वह छोटी सी रस्म को भी कहानी का संकेत बना देता है।
तकनीकी तौर पर देखें तो मेहंदी के दृश्य हमेशा क्लोज अप में फिल्माए जाते हैं। हाथों पर उकेरे डिजाइन, उंगलियों का कंपन, आंखों में झलकता सपना। निर्देशक जानते हैं कि यह दृश्य दर्शक के मन में सीधे उतरता है। ढोलक, शहनाई और लोकधुनों के साथ जब मेहंदी गीत बजते हैं तो पूरा माहौल जीवंत हो उठता है। यही कारण है कि मेहंदी गीतों में लोक संगीत की झलक अधिक मिलती है।
मेरे लिए मेहंदी वाले गीत सिर्फ शादी के गाने नहीं हैं। उनमें एक मासूम प्रतीक्षा होती है। जब मेहंदी लगा के रखना सुनता हूँ तो 90 के दशक की शादियाँ याद आती हैं। जब मेहंदी है रचने वाली बजता है तो लगता है जैसे किसी पुराने आंगन में बैठकर रस्म निभाई जा रही हो। और जब महबूब की मेहंदी हाथों में याद आता है तो 70 के दशक का रोमांटिक सिनेमा सामने आ जाता है।
बॉलीवुड ने मेहंदी को कभी हल्के में नहीं लिया। उसे कहानी का हिस्सा बनाया। कभी प्रेम का प्रतीक, कभी पीड़ा का, कभी सामाजिक टिप्पणी का। मेहंदी का रंग हर दौर में नया अर्थ लेकर आया है। शायद यही वजह है कि इतने सालों बाद भी जब किसी फिल्म में मेहंदी का सीन आता है तो दर्शक मुस्कुरा देता है।
परदे पर रची मेहंदी हमें सिर्फ शादी की रस्म नहीं दिखाती, वह हमारी संस्कृति, हमारे रिश्तों और हमारी भावनाओं का रंग दिखाती है। और सच कहूं तो यह रंग अभी फीका नहीं पड़ा है। हर नई फिल्म में जब भी दुल्हन के हाथों पर मेहंदी रचती है, सिनेमा एक बार फिर हमारी परंपरा को सलाम करता है।
बॉलीवुड के इस लंबे सफर में मेहंदी सिर्फ एक शब्द नहीं रही, वह एक एहसास रही है। एक ऐसा एहसास जो हर पीढ़ी ने अपने तरीके से महसूस किया है और आगे भी करता रहेगा।
2001 के बाद भी मेहंदी परदे से गायब नहीं हुई, बल्कि उसका रूप बदल गया। अब मेहंदी किसी एक गीत का शीर्षक भर नहीं रही, बल्कि पूरी वेडिंग एस्थेटिक्स का हिस्सा बन गई। तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों में देसी शादी का माहौल हो, टू स्टेट्स में अलग संस्कृतियों का मेल हो, या बैंड बाजा बारात में शादी उद्योग का चमकता रूप, मेहंदी हर बार मौजूद रहती है। भले गीत का नाम मेहंदी न हो, लेकिन रस्म दिखाई देती है।
रब ने बना दी जोड़ी, ये जवानी है दीवानी, हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया, बद्रीनाथ की दुल्हनिया, कलंक, धड़क, और हाल के कई शादी आधारित फिल्मों में मेहंदी रस्म अब विजुअल भव्यता के साथ आती है। बड़े सेट, रंगीन पोशाकें, कोरियोग्राफ्ड डांस और कैमरे की घूमती हुई चाल के बीच मेहंदी का दृश्य अब सिनेमाई तमाशा भी बन गया है। पहले जहाँ कैमरा हाथों के डिजाइन पर ठहरता था, अब वह पूरे समारोह को कैद करता है।
आज की फिल्मों में मेहंदी सिर्फ दुल्हन की नहीं, पूरे परिवार की रस्म बन चुकी है। दोस्त, बहनें, माँ, सब हाथों पर रंग रचाते दिखते हैं। गीतों में लोक और पॉप का मिश्रण होता है। पंजाबी बीट्स और पारंपरिक बोल साथ चलते हैं। शादी की प्लेलिस्ट में चाहे पुराना मेहंदी लगा के रखना बजे या नया डांस नंबर, रस्म वही रहती है।
समय बदला, सिनेमा बदला, लेकिन मेहंदी का अर्थ नहीं बदला। वह आज भी प्रेम, उम्मीद और नए सफर का प्रतीक है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब उसका प्रस्तुतीकरण भव्य हो गया है। लेकिन जब भी हाथों पर मेहंदी रचती है, दर्शक के मन में वही पुरानी मुस्कान लौट आती है।

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