मर्दानी 3 रिव्यू: क्या रानी मुखर्जी की तीसरी पारी उतनी प्रभावशाली है?
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| मर्दानी 3 में रानी मुखर्जी एक बार फिर सख्त पुलिस अधिकारी के रूप में |
मर्दानी 3 (2026) फिल्म समीक्षा, रानी मुखर्जी की वापसी, लेकिन क्या तीसरी कड़ी सच में सबसे मजबूत है?
मैं मर्दानी फ्रैंचाइज़ी को शुरू से फॉलो करता रहा हूँ। पहली फिल्म ने जिस तरह बाल तस्करी जैसे गंभीर विषय को सामने रखा था, उसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था। दूसरी फिल्म ज्यादा सख्त और निर्णायक थी। इसलिए जब मर्दानी 3 रिलीज हुई तो मेरे मन में उम्मीद भी थी और यह आशंका भी कि कहीं यह सिर्फ सीक्वल की औपचारिकता बनकर न रह जाए।
मर्दानी 3 का निर्देशन अभिराज मीनावाला ने किया है और इसे यशराज फिल्म्स ने प्रोड्यूस किया है। फिल्म में रानी मुखर्जी एक बार फिर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार में हैं। उनके साथ मल्लिका प्रसाद, जानकी बोड़ीवाला और अन्य सह कलाकार अहम भूमिकाओं में नजर आते हैं। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और संगीत कहानी के माहौल को गंभीरता देने का काम करता है, हालांकि यह फिल्म गीत प्रधान नहीं बल्कि पूरी तरह कथा आधारित क्राइम ड्रामा है।
फिल्म 30 जनवरी को सिनेमाघरों में आई और मैंने पहले दिन का दूसरा शो देखा। पहली बात जो महसूस हुई, वह यह कि रानी मुखर्जी आज भी शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार में पूरी तरह ढली हुई लगती हैं। स्क्रीन पर उनका प्रवेश होते ही वही सख्ती, वही शांत लेकिन भीतर से उबलती ऊर्जा दिखती है। यह किरदार अब उनके साथ इतना जुड़ चुका है कि अलग से अभिनय करते हुए नहीं, जीते हुए नजर आता है।
कहानी इस बार एक हाई प्रोफाइल किडनैपिंग से शुरू होती है। एक प्रभावशाली व्यक्ति की बेटी अचानक गायब हो जाती है। शुरू में मामला सिर्फ अपहरण लगता है, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, एक बड़ा मानव तस्करी नेटवर्क सामने आता है। बच्चों को अगवा कर अलग-अलग जगहों पर बेचे जाने का सिलसिला और उसके पीछे काम कर रहा एक संगठित गिरोह कहानी को गंभीर दिशा देता है। इस गिरोह की कमान संभाल रही है अम्मा नाम की महिला, जो बाहर से शांत दिखती है लेकिन भीतर से बेहद निर्दयी है।
पहला हाफ मुझे काफी मजबूत लगा। जांच की प्रक्रिया, सुरागों की परतें खुलना, पुलिस की रणनीति और अपराधियों का चालाक नेटवर्क माहौल में पकड़ बनाए रखते हैं। कई दृश्य ऐसे हैं जहाँ सिनेमा हॉल में सन्नाटा छा जाता है। शिवानी का अपने तरीके से पूछताछ करना, दबाव बनाना और सिस्टम के भीतर रहते हुए सिस्टम से लड़ना देखने में प्रभावशाली लगता है।
रानी मुखर्जी ने फिर साबित किया कि वे सिर्फ स्टार नहीं, ठोस अभिनेत्री हैं। उनके चेहरे की कठोरता और आंखों की बेचैनी दोनों साथ चलते हैं। कई जगहों पर संवाद कम हैं, लेकिन उनकी चुप्पी ज्यादा असर छोड़ती है। यही इस किरदार की ताकत है।
विलेन के रूप में मल्लिका प्रसाद का अम्मा वाला किरदार दिलचस्प है। वह शोर नहीं मचाती, लेकिन उसकी मौजूदगी सिहरन पैदा करती है। उसका नेटवर्क, उसकी रणनीति और उसकी निर्दयता कहानी को एक अलग स्तर देती है। हालांकि मुझे लगा कि कुछ जगहों पर उसके किरदार को और गहराई दी जा सकती थी।
अब बात उस हिस्से की जो मुझे थोड़ा कमजोर लगा। फिल्म का दूसरा हाफ। जहाँ पहले हाफ में जांच की ठोस जमीन थी, वहीं बाद में कहानी कई मोड़ों पर जल्दी-जल्दी भागती हुई लगती है। कुछ ट्विस्ट ऐसे हैं जो चौंकाते हैं, लेकिन पूरी तरह संतुष्ट नहीं करते। ऐसा लगा जैसे कई विचार एक साथ डाल दिए गए हों, लेकिन उन्हें पूरी तरह विकसित होने का समय नहीं मिला।
तकनीकी रूप से फिल्म मजबूत है। सिनेमैटोग्राफी डार्क और यथार्थवादी टोन रखती है। बैकग्राउंड स्कोर कई जगह दृश्य में बेचैनी कायम रखता है। एक्शन सीक्वेंस जरूरत भर हैं, ओवरड्रामेटिक नहीं। यही बात मुझे अच्छी लगी कि फिल्म सिर्फ मारधाड़ पर निर्भर नहीं है।
फ्रैंचाइज़ी की तुलना करें तो पहली मर्दानी सबसे ज्यादा असरदार थी क्योंकि उसका विषय और ट्रीटमेंट दोनों नए थे। दूसरी फिल्म ज्यादा सख्त और निर्णायक थी। तीसरी फिल्म इन दोनों को जोड़ने की कोशिश करती है, लेकिन जोड़ हमेशा बराबरी का परिणाम नहीं देता। एक और दो का जोड़ तीन बनता है, लेकिन प्रभाव हमेशा पहले जैसा नहीं रहता।
फिर भी, यह कहना गलत होगा कि मर्दानी 3 कमजोर फिल्म है। यह आज के दौर में भी ऐसे मुद्दे को सामने लाती है जिस पर चर्चा जरूरी है। बच्चों की तस्करी, सिस्टम की सीमाएँ और पुलिस की जिम्मेदारी आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
अगर आप तेज रफ्तार मसाला फिल्म की उम्मीद से जाएंगे तो शायद निराश हों। लेकिन अगर आपको गंभीर क्राइम थ्रिलर पसंद है और रानी मुखर्जी को इस किरदार में देखना अच्छा लगता है, तो फिल्म देखने लायक है। खासकर पहला हाफ आपको बांधे रखता है।
मेरे लिए मर्दानी 3 एक संतुलित लेकिन अधूरी संतुष्टि वाली फिल्म रही। अच्छी है, लेकिन याद रह जाने वाली नहीं। मजबूत है, लेकिन पहली जैसा भीतर तक उतर जाने वाला असर नहीं छोड़ती। रानी मुखर्जी ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है, बस कहानी थोड़ी और धारदार होती तो प्रभाव और गहरा हो सकता था।
अब सवाल यह है कि क्या मर्दानी फ्रैंचाइज़ी को यहीं रुक जाना चाहिए या चौथी कड़ी की गुंजाइश है। अगर कहानी सच में नई और साहसी हो, तो क्यों नहीं। लेकिन सिर्फ नाम के लिए सीक्वल बने, तो शायद असर कम होता जाएगा।
आपने मर्दानी 3 देखी है? आपको पहली, दूसरी या तीसरी कौन सी सबसे ज्यादा मजबूत लगी?

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