Namkeen 1982 Review in Hindi: गुलज़ार की संवेदनशील कहानी
नमकीन: कुछ फिल्में खत्म नहीं होतीं, बस चलती रहती हैं
1982 में आई गुलज़ार की फिल्म नमकीन पहली नज़र में बहुत साधारण लगती है। संजीव कुमार, शर्मिला टैगोर, शबाना आज़मी, वहीदा रहमान और किरण वैराले जैसे कलाकारों से सजी यह फिल्म किसी बड़े नाटकीय ढांचे पर नहीं टिकी है। लेकिन जितनी सादगी से यह आगे बढ़ती है, उतनी ही गहराई से भीतर उतरती जाती है।
नमकीन मेरे लिए सिर्फ एक फिल्म नहीं है, एक एहसास है जो खत्म होने के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं होता। पहाड़ों में एक छोटा सा घर। एक बूढ़ी माँ और उसकी तीन बेटियाँ। जीवन साधारण है, लेकिन भीतर बहुत कुछ दबा हुआ है।
एक पहाड़ी घर की कहानी
नमकीन की कहानी एक पहाड़ी गाँव में रहने वाली जुगनी और उसकी तीन बेटियों के इर्द-गिर्द घूमती है। जुगनी का अतीत नौटंकी से जुड़ा रहा है, लेकिन अब वह अपनी बेटियों के साथ सादा जीवन जी रही है। घर की आर्थिक हालत मजबूत नहीं है, इसलिए वे अपने घर में एक ट्रक ड्राइवर गेरुलाल को किराए पर रखती हैं। गेरुलाल धीरे-धीरे उस घर का हिस्सा बन जाता है। बेटियों की अलग-अलग इच्छाएँ, दबे हुए सपने और जुगनी की चिंता कहानी को आगे बढ़ाती है। फिल्म किसी बड़े घटनाक्रम पर नहीं टिकी, बल्कि छोटे-छोटे भावनात्मक बदलावों के सहारे अपने निष्कर्ष तक पहुँचती है।
शर्मिला टैगोर की निमकी
शर्मिला टैगोर इस फिल्म की धुरी हैं। निमकी के रूप में वह घर की जिम्मेदारी संभालती हुई, भीतर से चुपचाप टूटती हुई लड़की लगती हैं। उनके चेहरे पर एक स्थायी गंभीरता है, जैसे जिंदगी ने बहुत जल्दी उन्हें बड़ा कर दिया हो। उनका अभिनय ऊँची आवाज़ वाला नहीं है, लेकिन लगातार असर छोड़ता है।
निमकी का किरदार फिल्म का भावनात्मक जमीन देता है। जब गेरुलाल के साथ उसके संबंध की हल्की सी संभावना बनती है, तो उसमें कोई फिल्मी रोमांस नहीं है। बस एक सादा सा अपनापन है, जो और भी सच्चा लगता है।
राहों पे रहते हैं और मन कहीं अटक जाता है
नमकीन का सबसे खूबसूरत हिस्सा मेरे लिए उसका गीत है, राहों पे रहते हैं। किशोर कुमार की आवाज़ में यह गीत सिर्फ गाना नहीं, एक चलता हुआ सफर लगता है। मुझे हमेशा यह परिचय के मुसाफिर हूं यारों की याद दिलाता है। वही दार्शनिक सादगी, वही रास्तों की फिलॉसफी।
जब यह गीत बजता है और गेरुलाल ट्रक में बैठकर चला जाता है, तो हर बार मन अटक जाता है। लगता है कहानी अभी बाकी है। शायद वह लौटेगा। शायद वह निमकी के जीवन में फिर से दस्तक देगा। लेकिन फिल्म वहीं रुक जाती है। और शायद यही उसकी खूबसूरती है।
वहीदा रहमान का सादा लेकिन गहरा असर
वहीदा रहमान इस फिल्म में एक थकी हुई लेकिन मजबूत माँ हैं। उनका टेढ़ा चश्मा ठीक करने वाला छोटा सा दृश्य मुझे हर बार छू जाता है। वह दृश्य बहुत मामूली है, लेकिन उसमें पूरा जीवन है। थकान भी है, जिद भी है और एक अजीब सी मजबूती भी।
उन्होंने अपने किरदार को किसी नाटकीय अंदाज़ में नहीं निभाया, बल्कि उसे जिया है।
शबाना आज़मी की संवेदनशील परत
शबाना आज़मी का किरदार फिल्म में एक और गहरी परत जोड़ता है। उनकी चुप्पी और भीतर की बेचैनी बहुत वास्तविक लगती है। नमकीन की ताकत यही है कि हर किरदार अधूरा है, और उसी अधूरेपन में सच्चाई है।
संजीव कुमार का गेरुलाल
संजीव कुमार यहाँ किसी नायक की तरह नहीं आते। वह एक मुसाफिर हैं। शायद इसलिए राहों पे रहते हैं गीत उनसे इतना जुड़ जाता है। उनके जाने के बाद जो खालीपन रह जाता है, वही नमकीन की असली पहचान है।
क्यों याद रह जाती है नमकीन
नमकीन बड़े संवादों वाली फिल्म नहीं है। यह धैर्य मांगती है। लेकिन जो इसे समय देता है, उसके भीतर यह चुपचाप जगह बना लेती है।
हर बार इसे देखकर मुझे लगता है कि कहानी खत्म नहीं हुई। गेरुलाल कहीं न कहीं उस पहाड़ी रास्ते पर है। और मैं इंतजार कर रहा हूँ कि वह फिर लौटे।
नमकीन उन फिल्मों में से है जो शोर नहीं करतीं, लेकिन असर छोड़ जाती हैं। और शायद इसी वजह से इतने साल बाद भी यह फिल्म मेरे साथ चलती रहती है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
यह मंच सिनेमा प्रेमियों के लिए है। कृपया सम्मानजनक भाषा में अपने विचार साझा करें। सार्थक बहस का स्वागत है, प्रचारात्मक या अपमानजनक टिप्पणियाँ स्वीकृत नहीं होंगी।