बॉलीवुड तब और अब भाग 4: 2000 के बाद का सिनेमा, मल्टीप्लेक्स और बदलता दर्शक
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| मल्टीप्लेक्स के साथ बदलता हुआ हिंदी सिनेमा और उसका दर्शक |
बॉलीवुड: तब और अब
भाग 4: 2000 के बाद का सिनेमा, मल्टीप्लेक्स का दौर और बदलता दर्शक
नमस्कार मित्रों,
अगर नब्बे का दशक हिंदी सिनेमा के लिए एक पुल था, तो दो हजार के बाद का दौर उस पुल के पार की दुनिया है। यहाँ आकर सिनेमा पूरी तरह बदल नहीं गया, लेकिन उसकी चाल, उसकी भाषा और उसका दर्शक सब कुछ धीरे धीरे अलग होने लगा।
यह वही समय है जब हम में से कई लोग पहली बार मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने गए। वही पॉपकॉर्न की खुशबू, वही एयर कंडीशन हॉल, वही टिकट के दाम पर घर में बहस। सिनेमा देखने का अनुभव बदल रहा था, और उसी के साथ बदल रहा था सिनेमा खुद।
एक नया दर्शक पैदा हो रहा था
2000 के बाद सबसे बड़ा बदलाव दर्शक में आया। अब सिनेमा सिर्फ एक सामूहिक अनुभव नहीं रहा। पहले पूरा मोहल्ला एक ही फिल्म देखता था, फिर उसी पर बात करता था। अब हर दर्शक अपनी पसंद लेकर आ रहा था।
कोई रोमांस चाहता था, कोई थ्रिलर, कोई हल्की फुल्की कॉमेडी, तो कोई बिल्कुल अलग तरह की कहानी। मल्टीप्लेक्स ने यह आज़ादी दी कि एक ही समय पर अलग अलग तरह की फिल्में चल सकें। इसका सीधा असर फिल्मों की सोच पर पड़ा।
छोटे बजट, बड़ी बातें
इस दौर में एक अच्छी बात यह हुई कि फिल्मों का बजट ही सब कुछ तय नहीं करने लगा। छोटी कहानियाँ, सीमित किरदार और कम लोकेशन वाली फिल्में भी अपनी जगह बनाने लगीं।
अब हर फिल्म को सौ करोड़ कमाने की ज़रूरत नहीं थी। कुछ फिल्में बस अपनी बात कहने आईं और चुपचाप चली गईं।
कहानी का दायरा बदला
2000 के बाद की फिल्मों में कहानियाँ ज़्यादा निजी हो गईं। अब हीरो पूरे सिस्टम से नहीं लड़ता था। वह अपने डर, अपनी असफलता और अपनी उलझनों से लड़ता था।
नायक अब हर हाल में सही नहीं होता था। कई बार वह गलत फैसले लेता था। कई बार वह हार जाता था। और शायद पहली बार ऐसा लगा कि परदे पर दिख रहा आदमी हम जैसा ही है।
रिश्तों को देखने का नया नजरिया
इस दौर की फिल्मों में रिश्ते भी बदले। माँ अब सिर्फ त्याग की मूर्ति नहीं रही। पिता सिर्फ सख्त इंसान नहीं रहा। पति पत्नी के रिश्ते में सवाल आने लगे।
फिल्में अब यह मानने लगीं कि हर रिश्ता आसान नहीं होता। और हर सवाल का जवाब ज़रूरी नहीं होता।
तकनीक अब कहानी के करीब
2000 के बाद तकनीक ने सिनेमा में बड़ी भूमिका निभानी शुरू की। कैमरा बेहतर हुआ, एडिटिंग तेज़ हुई और साउंड डिज़ाइन पर ध्यान दिया जाने लगा।
फिल्में देखने में साफ और सुनने में बेहतर होने लगीं। लेकिन अगर कहानी कमजोर होती थी, तो दर्शक माफ नहीं करता था।
संगीत का बदलता रोल
इस दौर में संगीत की भूमिका भी बदली। अब हर फिल्म में ढेर सारे गाने होना ज़रूरी नहीं रहा। कुछ फिल्मों में गाने कहानी को आगे बढ़ाते थे, कुछ में बस माहौल बनाते थे।
2000 के बाद की कुछ यादगार फिल्में
इस दौर की फिल्मों ने साफ किया कि हिंदी सिनेमा अब एक ही रास्ते पर नहीं चल रहा। अलग अलग तरह की फिल्में साथ साथ मौजूद थीं।
शहर और कस्बे की दूरी
मल्टीप्लेक्स के साथ सिनेमा ज़्यादा शहरी होता गया। कस्बाई और ग्रामीण कहानियाँ पीछे छूटने लगीं। यह इस दौर की एक सीमा भी थी।
प्रयोग और जोखिम
इस दौर की सबसे बड़ी ताकत प्रयोग थी। कुछ प्रयोग सफल हुए, कुछ असफल, लेकिन कोशिश जारी रही। फिल्में अब हर किसी को खुश करने की कोशिश नहीं कर रही थीं।
क्या कुछ खोया भी
इस बदलाव में वह सामूहिक शोर, सीटियाँ और तालियाँ पीछे छूट गईं। मल्टीप्लेक्स का सिनेमा थोड़ा सभ्य हुआ और शायद थोड़ा अकेला भी।
फिर भी यह दौर ज़रूरी है
2000 के बाद का सिनेमा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इसने हिंदी सिनेमा को रुकने नहीं दिया। नई पीढ़ी, नई कहानियाँ और नई भाषा यहीं से निकलीं।
यही दौर आगे आने वाले डिजिटल और ओटीटी सिनेमा की नींव भी बना। उसकी कहानी अभी बाकी है।

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