बॉलीवुड तब और अब भाग 2: 80 के दशक का सिनेमा, गिरावट और समानांतर फिल्में

80 के दशक के हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा और समानांतर फिल्मों को दर्शाती इमेज
80 के दशक में हिंदी सिनेमा का संक्रमण काल

नमस्कार मित्रों,

पिछले भाग में हमने 60 और 70 के दशक के हिंदी सिनेमा की बात की थी। उस दौर की जब कहानी, विचार और समाज सिनेमा के केंद्र में थे। आज इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए बात करेंगे 80 के दशक की।

80 का दशक हिंदी सिनेमा के इतिहास का सबसे ज्यादा गलत समझा गया दौर है। आम तौर पर इसे गिरावट का समय कहकर निपटा दिया जाता है। लेकिन सच यह है कि यह दौर सिर्फ गिरावट नहीं था, बल्कि मजबूरी, उलझन और बदलाव की तैयारी का समय था।

बॉलीवुड तब और अब भाग 2

80 का दशक गिरावट, मजबूरी और समानांतर सिनेमा

जब हिंदी सिनेमा के इतिहास की बात होती है, तो 80 के दशक को अक्सर सबसे कमजोर दौर कह दिया जाता है। यह वही समय था जब दर्शक बदल रहा था, लेकिन सिनेमा अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहा था।

70 के दशक की थकान

70 के दशक के अंत तक गुस्सैल नौजवान का फॉर्मूला थकने लगा था। वही बदला, वही मां, वही सिस्टम से लड़ाई अब दोहराव लगने लगी थी। दर्शक आगे बढ़ चुका था, लेकिन सिनेमा अभी भी पुराने जवाब दे रहा था।

स्टार सिस्टम मजबूत था, लेकिन कहानी कमजोर होने लगी थी। निर्माता सुरक्षित रास्ते चुनने लगे थे और जोखिम लेने से बच रहे थे। नतीजा यह हुआ कि कई फिल्में एक जैसी दिखने लगीं।

तकनीक के लिहाज से भी सिनेमा एक अजीब दौर में था। रंगीन फिल्में आम हो चुकी थीं, लेकिन कैमरे की भाषा में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता था। प्रस्तुति में शोर बढ़ रहा था, लेकिन कहानी उसका साथ नहीं दे पा रही थी।

वीडियो पाइरेसी और सिनेमा हॉल का संकट

80 के दशक में सिनेमा को सबसे बड़ा झटका वीडियो पाइरेसी से लगा। वीसीआर और वीडियो कैसेट ने घर बैठे फिल्म देखने की आदत डाल दी। इसका सीधा असर सिनेमा हॉल पर पड़ा।

निर्माता अब बड़े प्रयोग करने से डरने लगे। कम बजट, जल्दी बनी और जल्दी बिकने वाली फिल्मों का दौर शुरू हुआ। इससे मुख्यधारा का सिनेमा धीरे धीरे कमजोर होता चला गया।

कई बड़े सितारे भी इस दौर में अपनी पुरानी छवि बचाने में लगे दिखे, नई पहचान गढ़ने में नहीं।

कहानी से ज्यादा शोर

इस दशक में एक्शन, चीखते संवाद और तेज संगीत बढ़ा, लेकिन कहानी पीछे छूटती गई। तकनीक अब कहानी को सहारा देने के बजाय उसे ढकने लगी।

फिल्में ज्यादा बोलने लगीं, लेकिन कहने को बहुत कुछ नहीं बचा था। यही वजह है कि 80 का दशक अक्सर सस्ते मनोरंजन और फॉर्मूला फिल्मों के लिए याद किया जाता है।

लेकिन यही पूरी सच्चाई नहीं है।

समानांतर सिनेमा की मजबूती

जहां मुख्यधारा सिनेमा भटक रहा था, वहीं समानांतर सिनेमा पूरी मजबूती के साथ खड़ा था।

यह वह समय था जब आम आदमी की जिंदगी, सामाजिक अन्याय और सिस्टम की सच्चाई को बिना चमक दमक के दिखाया जा रहा था। ये फिल्में कम दर्शकों तक पहुंचीं, लेकिन उन्होंने सिनेमा की आत्मा को जिंदा रखा।

Ardh Satya, Jaane Bhi Do Yaaro, Mirch Masala जैसी फिल्मों ने यह साबित किया कि सिनेमा सिर्फ मसाला नहीं, एक सोच भी हो सकता है।

इन फिल्मों में तकनीक सीमित थी, लेकिन नजर साफ थी। यहां नायक सुपरहीरो नहीं, बल्कि वही इंसान था जो रोजमर्रा की जिंदगी में सिस्टम से जूझ रहा था।

80 का दशक क्यों जरूरी था

80 का दशक इसलिए जरूरी था क्योंकि इसने सिनेमा को आईना दिखाया। यह दौर बताता है कि सिर्फ पुराने फॉर्मूले दोहराने से सिनेमा आगे नहीं बढ़ सकता।

यही वह समय था जिसने आगे आने वाले बदलावों की जमीन तैयार की। मल्टीप्लेक्स संस्कृति, नए निर्देशक और अलग तरह की कहानियां इसी असंतोष से पैदा हुईं।

क्या पाया और क्या खोया

80 के दशक में हिंदी सिनेमा ने अपनी चमक खोई, लेकिन आत्मा नहीं।

मुख्यधारा कमजोर हुई, लेकिन सोच मजबूत हुई।

बड़े सितारे थके, लेकिन नए विचार जन्म लेने लगे।

यह दशक भले ज्यादा याद न किया जाए, लेकिन इसके बिना आगे का सिनेमा समझा ही नहीं जा सकता।

अगले भाग में

अगले भाग में बात करेंगे 90 के दशक की।

जब प्रेम, परिवार और संगीत ने सिनेमा को फिर से दर्शकों के करीब ला दिया।

लेकिन क्या यह सच में वापसी थी। या बस एक नई तरह की कहानी।

भाग 3 में इसी पर बात करेंगे।

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