मेरे जीवन साथी (1972) समीक्षा | Rajesh Khanna Classic Film Review

Mere Jeevan Saathi 1972 Rajesh Khanna Tanuja film scene
राजेश खन्ना और तनुजा की 1972 की यादगार फिल्म मेरे जीवन साथी का दृश्य

मेरे जीवन साथी (1972) : एक दौर, एक आवाज़, एक अधूरा सा प्रेम

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिन्हें देखते वक्त लगता है कि हम सिर्फ कहानी नहीं देख रहे, बल्कि एक पूरा दौर देख रहे हैं। “मेरे जीवन साथी” उन्हीं फिल्मों में से एक है। 1972 का समय, राजेश खन्ना अपने शिखर पर, आर.डी. बर्मन का संगीत अपने पूरे रंग में, और पर्दे पर एक ऐसी प्रेम कहानी जो सीधी भी है और उलझी हुई भी। यह फिल्म पहली बार देखने पर शायद एक सामान्य रोमांटिक ड्रामा लगे, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखो तो इसमें भावनाओं की कई परतें हैं।

कहानी प्रकाश की है, एक सफल कलाकार जिसकी दुनिया रंगों और सपनों से भरी है। वह पेंटिंग करता है, जीवन को खुलकर जीता है और अपनी कला में डूबा रहता है। लेकिन एक हादसा उसकी पूरी दुनिया बदल देता है। उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है। एक कलाकार के लिए इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है। फिल्म यहीं से अपना भावनात्मक वजन पकड़ती है। राजेश खन्ना इस मोड़ पर सिर्फ एक रोमांटिक हीरो नहीं रहते, बल्कि एक ऐसा इंसान बन जाते हैं जो अचानक अंधेरे में धकेल दिया गया है। उनके चेहरे का खालीपन, आवाज़ में आ जाने वाली थकान और भीतर की बेचैनी बहुत सच्ची लगती है।

इसी अंधेरे में ज्योति की एंट्री होती है। तनुजा ने इस किरदार को बड़ी सादगी से निभाया है। वह डॉक्टर है और प्रकाश का इलाज करती है। शुरुआत में दोनों के बीच एक औपचारिक रिश्ता है, लेकिन धीरे-धीरे एक अपनापन पनपता है। ज्योति सिर्फ उसकी आंखों की दवा नहीं करती, वह उसके टूटे हुए आत्मविश्वास को भी संभालती है। तनुजा का अभिनय बहुत सहज है। वह ज़्यादा संवादों से नहीं, बल्कि भाव से असर छोड़ती हैं। उनके चेहरे पर एक मासूम दृढ़ता है जो किरदार को विश्वसनीय बनाती है

फिल्म में हेलन का किरदार कामिनी कहानी को एक अलग रंग देता है। वह ग्लैमरस है, आकर्षक है और अपने तरीके से महत्वाकांक्षी भी। कामिनी के आने से रिश्तों में एक अस्थिरता पैदा होती है। प्रकाश के सामने दो रास्ते हैं। एक तरफ सादगी और सच्चाई है, दूसरी तरफ आकर्षण और भ्रम। हेलन का अभिनय सिर्फ चमक तक सीमित नहीं है। उनके किरदार में एक चालाकी और स्वार्थ की झलक भी है, जो कहानी को थोड़ा नाटकीय लेकिन दिलचस्प बना देती है।

राजेश खन्ना का अभिनय इस फिल्म की रीढ़ है। उस दौर में उनका स्टारडम अलग स्तर पर था, लेकिन यहाँ वे सिर्फ स्टार नहीं लगते, किरदार लगते हैं। अंधेपन के बाद का उनका संघर्ष कई जगह बहुत प्रभावशाली है। जब वह दूसरों पर निर्भर होने की मजबूरी महसूस करते हैं, तब उनके चेहरे की हल्की सी झुंझलाहट भी बहुत कुछ कह जाती है। यह फिल्म उनकी रोमांटिक छवि के साथ-साथ उनकी भावनात्मक गहराई भी दिखाती है।

फिल्म की गति आज के हिसाब से धीमी लग सकती है। दृश्य लंबे हैं, संवाद पूरे हैं, गाने कहानी में ठहरकर आते हैं। लेकिन उसी ठहराव में एक अलग सुख है। उस दौर का सिनेमा जल्दी में नहीं था। कहानी को सांस लेने का समय दिया जाता था। यही वजह है कि किरदार धीरे-धीरे दर्शक के करीब आते हैं।

और फिर संगीत। इस फिल्म की असली पहचान उसका संगीत है। आर.डी. बर्मन ने जो धुनें दीं, वे आज भी ताज़ा लगती हैं। “ओ मेरे दिल के चैन” सुनते ही जैसे पुरानी यादों की खिड़की खुल जाती है। किशोर कुमार की आवाज़ में जो सुकून है, वह इस गाने को अमर बना देता है। “चला जाता हूँ किसी की धुन में” में एक हल्की मुस्कान है, एक बेफिक्र अंदाज़ है। और “कितने सपने कितने अरमान” में एक उदासी है जो दिल को छू जाती है। कई लोग फिल्म भूल जाएँगे, लेकिन ये गाने नहीं भूलेंगे।

यह फिल्म पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। कुछ जगह कहानी खिंचती है, कुछ मोड़ ज़रा ज़्यादा नाटकीय लगते हैं। लेकिन इसके बावजूद इसमें एक सच्चाई है। जब प्रकाश अपने भीतर के अंधेरे से जूझता है, जब ज्योति उसके साथ खड़ी रहती है और जब कामिनी की असलियत सामने आती है, तब फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं रह जाती, वह रिश्तों की परीक्षा बन जाती है।

मैंने जब इसे पहली बार देखा था, तब गाने ज़्यादा याद रहे। दूसरी बार देखने पर किरदार समझ आए। तीसरी बार लगा कि यह सिर्फ प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि चुनाव की कहानी है। जीवन में कभी-कभी हमें आकर्षण और सच्चाई में से एक चुनना पड़ता है। फिल्म इसी द्वंद्व को दिखाती है।

आज के तेज़ दौर में शायद यह फिल्म कुछ लोगों को धीमी लगे। लेकिन अगर आप सत्तर के दशक के सिनेमा की लय को महसूस करना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। इसमें शोर नहीं है, दिखावा नहीं है, लेकिन एक भाव है जो धीरे-धीरे असर करता है।

“मेरे जीवन साथी” कोई क्रांतिकारी फिल्म नहीं है, लेकिन यह उस दौर का आईना है। राजेश खन्ना की लोकप्रियता, तनुजा की सादगी और आर.डी. बर्मन का संगीत मिलकर इसे खास बनाते हैं। अगर आपने नहीं देखी, तो एक शाम निकालकर देख सकते हैं। और अगर देखी है, तो बस उसके गाने सुन लीजिए। शायद आपको भी लगे कि कुछ धुनें सच में समय से परे होती हैं।

70s के दशक की और फिल्मों की समीक्षा पढ़नी है तो यहां आए।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Dhurandhar 2025 Review Hindi: बॉक्स ऑफिस, OTT रिलीज़, बेस्ट डायलॉग

Anhonee 1952 Review in Hindi: राज कपूर नर्गिस क्लासिक

मर्दानी 3 रिव्यू: क्या रानी मुखर्जी की तीसरी पारी उतनी प्रभावशाली है?