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मर्दानी 3 रिव्यू: क्या रानी मुखर्जी की तीसरी पारी उतनी प्रभावशाली है?

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मर्दानी 3 में रानी मुखर्जी एक बार फिर सख्त पुलिस अधिकारी के रूप में मर्दानी 3 (2026) फिल्म समीक्षा, रानी मुखर्जी की वापसी, लेकिन क्या तीसरी कड़ी सच में सबसे मजबूत है? मैं मर्दानी फ्रैंचाइज़ी को शुरू से फॉलो करता रहा हूँ। पहली फिल्म ने जिस तरह बाल तस्करी जैसे गंभीर विषय को सामने रखा था, उसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था। दूसरी फिल्म ज्यादा सख्त और निर्णायक थी। इसलिए जब मर्दानी 3 रिलीज हुई तो मेरे मन में उम्मीद भी थी और यह आशंका भी कि कहीं यह सिर्फ सीक्वल की औपचारिकता बनकर न रह जाए। मर्दानी 3 का निर्देशन अभिराज मीनावाला ने किया है और इसे यशराज फिल्म्स ने प्रोड्यूस किया है। फिल्म में रानी मुखर्जी एक बार फिर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शिवानी शिवाजी रॉय के किरदार में हैं। उनके साथ मल्लिका प्रसाद, जानकी बोड़ीवाला और अन्य सह कलाकार अहम भूमिकाओं में नजर आते हैं। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और संगीत कहानी के माहौल को गंभीरता देने का काम करता है, हालांकि यह फिल्म गीत प्रधान नहीं बल्कि पूरी तरह कथा आधारित क्राइम ड्रामा है। फिल्म 30 जनवरी को सिनेमाघरों में आई और मैंने पहले दिन का दूसरा शो देखा। पहली बात जो ...

शर्मिली (1971) फिल्म समीक्षा | Shashi Kapoor–Rakhee Classic Review

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शर्मिली (1971) शशि कपूर और राखी की यादगार जोड़ी शर्मिली (1971): प्यार, पहचान और देशभक्ति के बीच उलझी एक अनोखी कहानी 1971 का दशक हिंदी सिनेमा के लिए बेहद दिलचस्प दौर था। रोमांस था, संगीत था, देशभक्ति थी और साथ में पहचान और रिश्तों की उलझी हुई कहानियाँ भी। इसी दौर में आई फिल्म शर्मिली, जिसने जुड़वा बहनों की कहानी को एक अलग अंदाज़ में पेश किया। निर्देशक थे समीर गांगुली। मुख्य भूमिका में थे शशि कपूर और राखी। संगीत दिया था सचिन देव बर्मन ने और गीत लिखे थे नीरज ने। यही टीम फिल्म को एक अलग ऊँचाई देती है। कहानी शुरू होती है कैप्टन अजीत कपूर से, जो भारतीय वायुसेना का एक सुसंस्कृत और संवेदनशील अधिकारी है। एक दिन वह एक शांत, सरल और बेहद सुसंस्कृत लड़की कामिनी से मिलता है। पहली मुलाकात में ही अजीत उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हो जाता है। कामिनी की आँखों में झिझक है, चाल में संकोच है और बातों में मासूमियत। अजीत का दिल साफ तौर पर उसी पर आ जाता है। लेकिन कहानी यहाँ सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ती। कामिनी की एक जुड़वा बहन है कंचन। और कंचन बिल्कुल उलट है। वह आधुनिक है, खुले विचारों वाली है, सिगरेट पीती है,...

Dhurandhar 2025 Review Hindi: बॉक्स ऑफिस, OTT रिलीज़, बेस्ट डायलॉग

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 धुरंधर: एक्शन थ्रिलर जिसने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचा 2025 में रिलीज़ हुई फिल्म धुरंधर भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े स्पाई एक्शन थ्रिलरों में से एक बन चुकी है। आदित्य धर द्वारा लिखित, निर्देशित और सह निर्मित यह फिल्म जियो स्टूडियोज और B62 स्टूडियोज के बैनर तले बनी, जिसे दर्शकों और समीक्षकों दोनों का जबरदस्त समर्थन मिला। इसमें रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना, संजय दत्त, आर माधवन, अर्जुन रामपाल, सारा अर्जुन और राकेश बेदी जैसे कलाकार हैं, जिनकी मौजूदगी ने फिल्म को और मजबूती दी। फिल्म का संगीत शाश्वत सचदेव ने दिया है और कहानी एक गुप्तचर एजेंट के इर्द गिर्द घूमती है जो कराची के अंडरवर्ल्ड नेटवर्क में घुसकर एक बड़े जासूसी ऑपरेशन को अंजाम देता है। धुरंधर नाम अपने आप में एक प्रतीक बन गया है। यहाँ एक साधारण व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि रणनीति, राजनीतिक तनाव और भावनात्मक जटिलताओं से भरी दुनिया दिखाई गई है। कथा में कई अंतरराष्ट्रीय घटनाओं की पृष्ठभूमि जैसा वातावरण रचा गया है, जिससे फिल्म का कैनवस और व्यापक हो जाता है। यह पूरी तरह बायोपिक नहीं है, बल्कि एक काल्पनिक लेकिन यथार्थ से प्रेरित जासूसी कथा है जि...

Arijit Singh Creative Freedom: फिल्मों से दूरी और इंडिपेंडेंट म्यूजिक की ओर?

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स्टारडम से आगे: अरिजीत सिंह और क्रिएटिव आज़ादी का फैसला अरिजीत सिंह ने आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी है कि वे अब फिल्मों के लिए नए गाने रिकॉर्ड नहीं करेंगे और प्लेबैक सिंगिंग से दूरी बना रहे हैं। यह फैसला उन्होंने अपने सोशल मीडिया पर खुद लिखा है जिसमें उन्होंने साफ किया कि अब वे नए असाइनमेंट स्वीकार नहीं करेंगे और अपने संगीत को नए रूप में जीना चाहते हैं। संगीत से उनका रिश्ता खत्म नहीं होगा, लेकिन उसका स्वरूप बदलेगा। यह सिर्फ चर्चा नहीं है, बल्कि खुद उनके शब्द हैं। उन्होंने लिखा कि यह एक अद्भुत यात्रा रही है और अब वे अपने संगीत सफर को एक नए मोड़ पर ले जाना चाहते हैं। अरिजीत सिंह आज सिर्फ एक गायक नहीं हैं, वे हमारी पीढ़ी की भावनाओं की आवाज़ हैं। पिछले दशक में अगर किसी ने हिंदी फिल्म संगीत में सबसे गहरी छाप छोड़ी है, तो वह उनका नाम है। उनके गीतों ने प्यार, दर्द, जुदाई, अपनापन और जोश हर भावना को ऐसी भाषा दी जो सीधे दिल तक पहुंची। 2013 में रिलीज़ हुआ तुम ही हो उनकी पहचान का सबसे बड़ा मोड़ था। यह गीत सिर्फ एक रोमांटिक ट्रैक नहीं था, बल्कि उस समय की प्रेम अभिव्यक्ति का प्रतीक बन गया। उसके बाद च...

Aap Ki Parchhaiyan 1964 Review Hindi | धर्मेन्द्र, मदन मोहन और रिश्तों की गहराई

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आप की परछाइयाँ (1964): रिश्तों का आईना और भावनाओं की परछाइयाँ परिवार चलाना आसान नहीं है। जीवन भर हम यही सीखते हैं कि प्यार के साथ जिम्मेदारी भी होती है, संस्कारों की एक डोरी होती है और रिश्तों को निभाने का तरीका ही उनकी असली ताकत बनता है। 1964 की फिल्म आप की परछाइयाँ इसी भावना को लेकर पर्दे पर आई थी। यह एक गहरा, संवेदनशील और विचारोत्तेजक पारिवारिक ड्रामा है जो धीरे-धीरे खुलता है और अंत तक दर्शक को सोचने पर मजबूर कर देता है। फिल्म का निर्देशन मोहन कुमार ने किया था। इसमें धर्मेन्द्र, शशिकला, सुप्रिया चौधरी, ओम प्रकाश और मनोरमा जैसे कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में हैं। संगीत मदन मोहन का है और गीतों को राजा मेहदी अली खान ने लिखा है। यह वह दौर था जब कहानी और संगीत दोनों मिलकर भावनाओं की दुनिया रचते थे। कहानी एक मध्यवर्गीय परिवार से शुरू होती है। दीनानाथ चोपड़ा और उनकी पत्नी अपने दो बेटों के साथ रहते हैं। बड़ा बेटा बलदेव और छोटा बेटा चंद्रमोहन परिवार का सहारा हैं। घर में सादगी है, आत्मसम्मान है और पारिवारिक जुड़ाव है। परिस्थितियाँ बदलती हैं जब बलदेव की शादी रेखा से होती है। रेखा एक संपन्न परिवार ...

बॉलीवुड परदे पर रची मेहंदी: फिल्मों और गीतों में मेहंदी का सफर

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बॉलीवुड परदे पर रची मेहंदी मेहंदी का रंग सिर्फ हाथों पर नहीं चढ़ता, वह मन पर भी चढ़ता है। भारतीय सिनेमा ने इस रंग को बहुत गहराई से समझा है। शादी का घर हो, दुल्हन का इंतज़ार हो, प्रेम का इकरार हो या बिछड़ने की टीस, मेहंदी हर बार किसी न किसी भावना की भाषा बनकर आई है। जब परदे पर मेहंदी रची जाती है तो वह सिर्फ एक रस्म नहीं रहती, वह कहानी का हिस्सा बन जाती है। बॉलीवुड में मेहंदी शब्द पर कई फिल्में बनीं। 1947 की फिल्म मेहंदी उस दौर के सामाजिक सिनेमा का हिस्सा थी, जब कहानियाँ परिवार और परंपराओं के इर्द गिर्द घूमती थीं। 1958 में आई मेहंदी ने इस शब्द को और भावनात्मक संदर्भ दिया। 1962 की फिल्म मेहंदी लगी मेरे हाथ तो सीधे शादी और नए रिश्तों की दुनिया में ले जाती है। उस दौर में मेहंदी का मतलब था उम्मीद, नया घर, नई शुरुआत। 1971 में महबूब की मेहंदी आई, जिसमें रोमांस और शायरी का खूबसूरत मेल था। राजेश खन्ना और लीना चंदावरकर की मौजूदगी ने मेहंदी को इश्क की पहचान बना दिया। 1980 की मेहंदी रंग लाएगी शीर्षक ही अपने आप में उम्मीद का वादा था। 1983 में फिर मेहंदी नाम से फिल्म आई, जहाँ पारिवारिक नाटक और सामाजि...

Anhonee 1952 Review in Hindi: राज कपूर नर्गिस क्लासिक

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अनहोनी 1952: कल रात देखी एक फिल्म जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया कल रात मैंने 1952 की फिल्म अनहोनी देखी। राज कपूर और नर्गिस की जोड़ी को कई बार देख चुका हूँ, लेकिन इस फिल्म का असर अलग था। यह वैसी फिल्म नहीं है जिसे देखकर आप बस कहानी खत्म होते ही आगे बढ़ जाएँ। इसे देखने के बाद थोड़ी देर चुप रहना पड़ता है। अनहोनी का निर्देशन के. ए. अब्बास ने किया था। वह सिर्फ निर्देशक नहीं थे, बल्कि एक विचारधारा वाले लेखक भी थे। उनकी फिल्मों में हमेशा समाज और इंसान की स्थिति पर गहरी नजर मिलती है। यहाँ भी वही बात साफ दिखाई देती है। कहानी एक प्रेम संबंध से शुरू होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह हालात और इंसान की नियति पर बहस में बदल जाती है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी नर्गिस की दोहरी भूमिका है। एक तरफ रूप है, जो संभ्रांत माहौल में पली-बढ़ी, सादगी और भरोसे से भरी लड़की है। दूसरी तरफ मोहिनी है, जो समाज के उस हिस्से से आती है जहाँ सम्मान से ज्यादा संघर्ष मिलता है। दोनों का चेहरा एक है, लेकिन जीवन की दिशा अलग। नर्गिस ने दोनों किरदारों को इतनी स्पष्टता से अलग किया है कि कभी भ्रम नहीं होता कि कौन सामने है। रूप की कोमलता और ...

Namkeen 1982 Review in Hindi: गुलज़ार की संवेदनशील कहानी

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  नमकीन: कुछ फिल्में खत्म नहीं होतीं, बस चलती रहती हैं 1982 में आई गुलज़ार की फिल्म नमकीन पहली नज़र में बहुत साधारण लगती है। संजीव कुमार, शर्मिला टैगोर, शबाना आज़मी, वहीदा रहमान और किरण वैराले जैसे कलाकारों से सजी यह फिल्म किसी बड़े नाटकीय ढांचे पर नहीं टिकी है। लेकिन जितनी सादगी से यह आगे बढ़ती है, उतनी ही गहराई से भीतर उतरती जाती है। नमकीन मेरे लिए सिर्फ एक फिल्म नहीं है, एक एहसास है जो खत्म होने के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं होता। पहाड़ों में एक छोटा सा घर। एक बूढ़ी माँ और उसकी तीन बेटियाँ। जीवन साधारण है, लेकिन भीतर बहुत कुछ दबा हुआ है। एक पहाड़ी घर की कहानी नमकीन की कहानी एक पहाड़ी गाँव में रहने वाली जुगनी और उसकी तीन बेटियों के इर्द-गिर्द घूमती है। जुगनी का अतीत नौटंकी से जुड़ा रहा है, लेकिन अब वह अपनी बेटियों के साथ सादा जीवन जी रही है। घर की आर्थिक हालत मजबूत नहीं है, इसलिए वे अपने घर में एक ट्रक ड्राइवर गेरुलाल को किराए पर रखती हैं। गेरुलाल धीरे-धीरे उस घर का हिस्सा बन जाता है। बेटियों की अलग-अलग इच्छाएँ, दबे हुए सपने और जुगनी की चिंता कहानी को आगे बढ़ाती है। फिल्म किसी बड़...

सनी देओल: घायल, घातक, बॉर्डर और गदर का सफर

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  सनी देओल: एक अभिनेता नहीं, हमारे दौर की आवाज़ कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनका नाम लेते ही सिर्फ फिल्में याद नहीं आतीं, पूरा समय याद आ जाता है। सनी देओल मेरे लिए ऐसे ही अभिनेता हैं। जब 90 का दशक चल रहा था, तब सिनेमा सिर्फ कहानी नहीं होता था, वह अनुभव होता था। थिएटर में सीटियाँ बजती थीं, डायलॉग पर लोग खड़े हो जाते थे और कुछ चेहरे स्क्रीन से उतरकर यादों में बस जाते थे।  सनी देओल उन्हीं चेहरों में से एक हैं। अर्जुन: भीतर जमा गुस्से की शुरुआत अर्जुन में सनी देओल ने एक ऐसे युवक का किरदार निभाया जो हालात से परेशान है लेकिन टूटता नहीं। यह फिल्म उस समय के समाज की बेचैनी को सामने लाती है। बेरोजगारी, सिस्टम की नाकामी और युवा का गुस्सा। अर्जुन का आक्रोश बनावटी नहीं लगता था। यहीं से सनी देओल की वह छवि बनने लगी जिसमें ईमानदार गुस्सा था। घायल: गुस्से को मिली पहचान घायल उनके करियर की निर्णायक फिल्म रही। यह सिर्फ एक्शन फिल्म नहीं थी। यह उस आम आदमी की आवाज़ थी जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है। अदालत वाले दृश्य आज भी याद किए जाते हैं। उनमें उनका संवाद बोलने का अंदाज़ और चेहरे की सख्ती बहुत प्रभाव...

Border 2 2026 Review Hindi: क्या पहली Border की बराबरी कर पाई?

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क्या Border 2 सच में पहली Border की बराबरी कर पाई? आंकलन समीक्षा जब किसी ऐसी फिल्म का सीक्वल बनता है जिसे लोग सिर्फ फिल्म नहीं, याद मानते हों, तो तुलना होना तय है। Border 1997 में आई थी, लेकिन वह आज भी सिर्फ एक युद्ध फिल्म के रूप में याद नहीं की जाती। वह भावनाओं, संगीत और देशभक्ति का ऐसा मिश्रण थी जिसने दर्शकों पर स्थायी असर छोड़ा। “संदेशे आते हैं” आज भी बज जाए तो दिल अपने आप भारी हो जाता है। ऐसे में Border 2 का आना अपने साथ उम्मीदें भी लाया और संदेह भी। सबसे पहले एक बात साफ कर दूँ। मैंने Border 2 23 जनवरी को रिलीज होते ही देखी। थिएटर में जाते समय मन में थोड़ा संशय था। लगा कहीं पूरी फिल्म फिर से सनी देओल के कंधों पर ही न टिकी हो। पहली Border की छवि इतनी मजबूत है कि तुलना अपने आप शुरू हो जाती है। लेकिन इस बार अनुभव अलग रहा। पहली Border के प्रभाव को समझना जरूरी है। उस समय का भारत अलग था। थिएटर में फिल्म देखना एक सामूहिक अनुभव होता था। विकल्प कम थे, ध्यान ज्यादा था। Border ने 1971 के युद्ध को सिर्फ गोलीबारी के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के साथ दिखाया। हर किरदार को समय मिला। स...

क्यों 90 के दशक की फिल्में आज भी दिल के करीब हैं? सिनेमा संवाद की शुरुआत

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नॉस्टेल्जिया का स्वर्णिम दशक क्यों 90 के दशक की फिल्में आज भी दिल के करीब हैं? और क्यों शुरू हुआ सिनेमा संवाद कभी-कभी 90 के दशक की कोई फिल्म टीवी पर आ जाती है और मैं रुक जाता हूँ। कहानी याद होती है, गाने याद होते हैं, यहाँ तक कि डायलॉग भी याद होते हैं, फिर भी देखता हूँ। शायद इसलिए नहीं कि फिल्म नई लगती है, बल्कि इसलिए कि वो एहसास नया लगता है। बहुत सालों से फिल्मों पर लिख रहा हूँ। पहले फेसबुक पर। वहाँ बहस होती थी, लोग कमेंट करते थे, कभी सहमति, कभी असहमति। लेकिन एक बात बार-बार महसूस हुई कि सोशल मीडिया पर लिखा हुआ ठहरता नहीं। पोस्ट कुछ घंटों तक चलती है, फिर भीड़ में गुम हो जाती है। उसी कमी को पूरा करने के लिए सिनेमा संवाद शुरू किया है। यह सिर्फ रिव्यू लिखने की जगह नहीं है। यह सिनेमा पर बात करने की जगह है। अब बात 90 के दशक की। क्या सच में वो दौर बेहतर था? या हम बस अपने समय को याद कर रहे हैं? जब दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे आई थी, तो प्रेम कहानी सिर्फ कहानी नहीं थी, एक सपना थी। बॉर्डर देखी तो देशभक्ति सीने में धड़कती थी। घायल या घातक जैसी फिल्मों में गुस्सा भी असली लगता था। उस दौर का हीरो चम...